मेहनत और पशुपालन का अनुभव जब वैज्ञानिक तकनीक और विभागीय मार्गदर्शन से जुड़ जाए तो पशुपालन केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि बेहतर आय का माध्यम भी बन सकता है। बालाघाट जिले के लालबर्रा विकासखंड के ग्राम कनकी के युवा पशुपालक कोमल गौतम की कहानी इसका उदाहरण है। कभी देशी नस्ल की भैंसों से कम दूध उत्पादन के कारण सीमित आमदनी करने वाले कोमल ने पशुपालन विभाग की सलाह पर पशुओं की नस्ल सुधार का रास्ता अपनाया और आज दुग्ध उत्पादन बढ़ने से उनकी आय में भी इजाफा हुआ है।
कोमल गौतम पहले देशी नस्ल की भैंसों का पालन करते थे और इन्हीं के दूध से अपना दुग्ध व्यवसाय संचालित करते थे। भैंसों की देखभाल और मेहनत के बावजूद देशी नस्ल की भैंसों से अपेक्षाकृत कम दूध प्राप्त होता था। इसका सीधा असर उनके दुग्ध व्यवसाय से होने वाली आय पर पड़ रहा था।
कोमल बताते हैं कि वे पशुपालन को और बेहतर तरीके से आगे बढ़ाना चाहते थे, लेकिन कम दूध उत्पादन उनके सामने बड़ी चुनौती थी। इसी दौरान पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने उन्हें पशुओं की नस्ल सुधार के संबंध में जानकारी दी और बताया कि उन्नत नस्ल के पशुओं के माध्यम से दूध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
मुर्रा नस्ल के नर भैंसे से शुरू हुआ बदलाव
पशुपालन विभाग के अधिकारियों की सलाह को कोमल ने गंभीरता से लिया। उन्होंने विभागीय योजना के माध्यम से मुर्रा नस्ल का नर भैंसा क्रय किया। इसके बाद उन्होंने अपने देशी नस्ल की भैंसों में मुर्रा नस्ल के नर भैंसे से प्राकृतिक गर्भाधान कराया। नस्ल सुधार की इस प्रक्रिया का परिणाम धीरे-धीरे सामने आने लगा। कोमल के पशुधन में मुर्रा नस्ल की मादा भैंसों की संख्या बढ़ने लगी। उन्नत नस्ल की भैंसों से दूध उत्पादन में भी वृद्धि हुई। इससे जहां पहले कम दूध उत्पादन के कारण आमदनी सीमित थी, वहीं अब अधिक दूध मिलने से दुग्ध व्यवसाय से होने वाली आय में भी इजाफा हुआ है।
पशुपालन में वैज्ञानिक सोच को अपनाने की सीख
कोमल गौतम का अनुभव यह बताता है कि पशुपालन में केवल पशुओं की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि पशुओं की नस्ल, स्वास्थ्य, पोषण और वैज्ञानिक प्रबंधन पर भी ध्यान देना जरूरी है। नस्ल सुधार के माध्यम से कम संख्या में भी बेहतर उत्पादकता हासिल की जा सकती है। कोमल अब अपने अनुभव को दूसरे पशुपालकों के साथ भी साझा कर रहे हैं।
वे दुग्ध व्यवसाय से जुड़े पशुपालकों को पशुओं की नस्ल सुधार अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका कहना है कि यदि पशुपालक विभागीय योजनाओं और विशेषज्ञों की सलाह का लाभ लेकर उन्नत नस्ल के पशुओं को अपनाएं तो दूध उत्पादन बढ़ाकर अपनी आमदनी में वृद्धि कर सकते हैं।
विभागीय मार्गदर्शन से मिली नई दिशा
कोमल गौतम की कहानी इस बात का उदाहरण है कि पशुपालन विभाग की योजनाएं और अधिकारियों का तकनीकी मार्गदर्शन ग्रामीण पशुपालकों के लिए आय बढ़ाने का माध्यम बन सकता है। नस्ल सुधार की दिशा में उठाया गया एक कदम उनके दुग्ध व्यवसाय के लिए बदलाव लेकर आया है। आज कोमल अपने पशुधन में बढ़े दूध उत्पादन और उससे होने वाली अतिरिक्त आय से उत्साहित हैं। उनका अनुभव दूसरे पशुपालकों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है कि पारंपरिक पशुपालन के साथ आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर दुग्ध व्यवसाय को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।


